बिहार के गया जी में पितृपक्ष में 50 हजार तीर्थयात्रियों ने किया पिंडदान,बहनों ने निभाया फर्ज तो मासूम ने मां को दिया मोक्ष

एम ए न्यूज डेस्क : गया की पावन भूमि पर इस पितृपक्ष में सिर्फ विधि-विधान नहीं, भावनाओं की बाढ़ उमड़ी. कोई मां के लिए आंखों में आंसू लिए पिंड चढ़ा रहा था तो कोई दादी के लिए कांपते हाथों से तर्पण कर रहा था. दो बहनों ने अपने माता-पिता को आखिरी विदाई दी. वहीं कई भावुक क्षण भी देखने को मिले जिसमें एक मासूम बेटे ने अपनी मां को मोक्ष दिलाने के लिए तिल-जल अर्पित किया.

गया तीर्थयात्रियों ने किया पिंडदान
मोक्ष नगरी गया जी में श्रद्धा, आस्था और पितृ भक्ति का संगम देखने को मिल रहा है. 6 सितंबर 2025 से शुरू हुए पितृपक्ष मेले के दूसरे दिन 50 हजार से अधिक तीर्थयात्रियों ने गया जी पहुंचकर फल्गु नदी के तट पर स्नान कर पिंडदान किया. पवित्र फल्गु नदी के किनारे आज एक विशाल जनसैलाब उमड़ पड़ा.
मध्यप्रदेश से पहुंचीं सगी बहनें
इस वर्ष पितृपक्ष मेले में कई भावुक क्षण भी देखने को मिले. मध्यप्रदेश से आईं सगी बहनें पूनम राठौर और सीमा राठौर अपने स्वर्गीय माता-पिता का पिंडदान करने आईं. दोनों बहनों के माता-पिता की मृत्यु कोरोना काल में 2021 में हो गई थी. उनका इकलौता भाई अब तक पिंडदान नहीं कर सका था. ऐसे में दोनों बहनों ने यह जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली और गया जी पहुंचकर पिंडदान का संकल्प पूरा किया.
मेरे माता-पिता की मौत कोरोना काल में हो गई थी. अब जाकर हमें यह सौभाग्य मिला कि हम उनका पिंडदान कर पाए. यह पल हमारे लिए अत्यंत भावुक और पुण्यदायी है.

पूनम राठौर
महिलाओं की बढ़ रही संख्या
गया जी में महिलाओं द्वारा पिंडदान करने की संख्या लगातार बढ़ रही है. यह सामाजिक और धार्मिक दृष्टिकोण से महिलाओं की भागीदारी और जागरूकता का भी प्रतीक है.
मां को मोक्ष दिलाने पहुंचा मासूम सार्थक
इसी बीच एक और दिल छू लेने वाला दृश्य तब सामने आया जब महज 6 साल का बच्चा सार्थक अपनी मां की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान करता नजर आया. साथ में उसकी दादी सुनीता देवी भी थीं. सुनीता देवी ने बताया कि सार्थक की मां का निधन तब हुआ था जब वह केवल 3 साल का था. अब जब वह थोड़ा समझदार हुआ, तो खुद गया जी में पिंडदान के लिए आने की इच्छा जाहिर की.
मेरी बहू की मृत्यु के बाद से यह दिन हमारे परिवार के लिए बहुत भावुक होता है, लेकिन आज सार्थक को अपने मां के मोक्ष की कामना करते देख मन गर्व से भर गया है.

सुनीता देवी दादी
पिता-पुत्र ने मिलकर किया दादी का पिंडदान
एक और मार्मिक दृश्य में, एक 6 साल के बालक ने अपने पिता के साथ मिलकर अपनी दादी का पिंडदान किया. पिता जगदीश राठौर ने बताया कि वह जब अपनी मां का पिंडदान करने गया जी आ रहे थे, तो उनके बेटे ने जिद की कि वह भी इस पुण्य कार्य में हिस्सा लेना चाहता है. इस प्रकार पिता-पुत्र दोनों ने मिलकर पिंडदान कर अपने पूर्वजों के मोक्ष की कामना की.
फल्गु नदी किनारे श्रद्धा की लहर
आज गया जी की फल्गु नदी के किनारे श्रद्धा का सैलाब नजर आया. पिंडवेदियों पर कतारों में लोग अपने पितरों के लिए तिल, जल और पिंड अर्पित कर रहे थे. पुरोहितों की मंत्रोच्चार और पवित्र ध्वनियों के बीच श्रद्धालुओं की आंखें नम थीं और हृदयों में अपने पूर्वजों के लिए सम्मान और प्रेम उमड़ रहा था.
बिहार के गयाजी में विश्व प्रसिद्ध पितृपक्ष मेला 6 सितंबर से शुरू हो चुका है, जो 21 सितंबर तक चलेगा. इस मेले में देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु अपने पितरों के मोक्ष की कामना लेकर गयाजी धाम पहुंच रहे हैं. पितृपक्ष के दौरान तीर्थयात्री पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध जैसे कर्मकांड करते हैं, जिससे उनके पूर्वजों को मोक्ष की प्राप्ति हो सके. मेले के पहले दिन से ही गयाजी में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगी है.

फल्गु नदी में स्नान का महत्व
वहीं आज से पितृ पक्ष की शुरुआत हो रही है. श्राद्ध के पहले दिन फल्गु नदी में स्नान का विशेष विधान है. मान्यता है कि फल्गु नदी में स्नान करने और इसके तट पर खीर के पिंड से पिंडदान करने से कुल की सभी पीढ़ियां तृप्त होती हैं और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है. धार्मिक ग्रंथों में फल्गु नदी को गंगा के समान पवित्र माना गया है, जिसके जल से तर्पण करने से भी पितरों को मोक्ष मिलता है.
खीर के पिंड से पिंडदान का विधान
मेले के दूसरे दिन फल्गु नदी के तट पर खीर के पिंड से पिंडदान करने की परंपरा है. श्रद्धालु पहले नदी में स्नान करते हैं और फिर तट पर खीर के पिंड बनाकर पितरों के नाम से पिंडदान करते हैं. पुराणों के अनुसार, इस कर्मकांड से न केवल पितरों को मोक्ष मिलता है, बल्कि समस्त कुल का उद्धार भी होता है। यह प्रथा गयाजी में विशेष महत्व रखती है.

पिंडदानियों की भारी भीड़
पितृपक्ष मेले के दूसरे दिन गयाजी में पिंडदानियों का सैलाब उमड़ पड़ा है. देश के विभिन्न राज्यों और विदेशों से आए श्रद्धालु अपने पितरों के लिए पिंडदान और तर्पण कर रहे हैं. गयाजी की मुख्य वेदियों में फल्गु नदी का विशेष स्थान है. स्थानीय गयापाल पंडा गजाधर कटरियार के अनुसार, तीर्थयात्रियों ने पंडों से पिंडदान की आज्ञा लेकर कर्मकांड शुरू किए हैं.
गयापाल पंडों की भूमिका
गयाजी में पिंडदान के कर्मकांड में गयापाल पंडों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. गजाधर कटरियार ने बताया कि दूसरे दिन तीर्थयात्रियों ने पंडों से पिंडदान की अनुमति ली और विधि-विधान से कर्मकांड संपन्न किए.
फल्गु तट पर होने वाला यह पिंडदान अमावस्या तक विभिन्न रूपों में जारी रहेगा, जिसमें नाना-नानी के श्राद्ध तक कर्मकांड किए जाते हैं.

गजाधर लाल कटरियार गयापाल पंडा
देश-विदेश से श्रद्धालुओं का आगमन
पितृपक्ष मेला गयाजी में एक वैश्विक आयोजन है, जिसमें लाखों की संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं. मेले के दौरान अलग-अलग दिनों में विभिन्न पिंडवेदियों पर पिंडदान और तर्पण का विधान है. विशेष रूप से दूसरे दिन फल्गु तट पर खीर के पिंड से पिंडदान का आयोजन होता है, जिसे पितरों के मोक्ष और कुल के उद्धार के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है.
पिंडदान के धार्मिक लाभ
पितृपक्ष मेले में त्रैपाक्षिक श्राद्ध का विधान पूरे पखवाड़े तक चलता है. जो श्रद्धालु पूरे पखवाड़े का श्राद्ध नहीं कर सकते, वे एक, तीन, पांच या आठ दिनों का पिंडदान कर सकते हैं. फल्गु तट पर पिंडदान के बाद विष्णुपद मंदिर में भगवान विष्णु के दर्शन करने से पितर प्रसन्न होते हैं और पिंडदानी को धार्मिक लाभ प्राप्त होता है. इस प्रकार, गयाजी में पितृपक्ष मेला पितरों के मोक्ष और श्रद्धालुओं के कल्याण का एक पवित्र अवसर है.
बिहार के गयाजी को मोक्ष भूमि कहा जाता है. यहां सदियों से पिंडदान और श्राद्ध का कर्मकांड होता आया है. माना जाता है कि बिना गयापाल पंडों की अनुमति और आशीर्वाद के पितरों का मोक्ष संभव नहीं है. यही वजह है कि गयापाल पंडों की परंपरा समय के साथ और भी मजबूत हुई.
14 गोत्र और उपनामों का रहस्य
गयापाल पंडों के 14 गोत्र हैं और उनसे जुड़े 1400 से अधिक घर. हर घर का एक अनोखा उपनाम है, जो सुनने में तो अजब-गजब लगता है लेकिन हर नाम के पीछे एक दिलचस्प कहानी छुपी हुई है. यही उपनाम इन परिवारों की पहचान बन गए. जजमान भी इन्हें इन्ही उपनामों के आधार पर देश और दुनियाभर में जानता है.
दो हाथी वाले पंडा जी
गुजरात रियासत से दो विशाल हाथी गयापाल पंडों को भेंट में मिले थे. कहते हैं कि जब वे हाथी पर सवार होकर पिंडदान कराने घाट की ओर निकलते, तो तीर्थयात्रियों की भीड़ उमड़ पड़ती. लोग उन्हें राजा जैसा सम्मान देते. वह नज़ारा इतना भव्य होता कि उनके घराने की पहचान ही हाथी से जुड़ गई. तब से यह परिवार “हाथी वाले पंडा जी” कहलाने लगा. आज भी जब शंभू लाल विट्ठल का नाम आता है, तो लोग गर्व से कहते हैं — यही हैं हाथी वाले पंडा जी.
हम लोग ब्रह्म ब्रह्म कल्पित ब्राह्मण है. 14 गोत्र से 1400 से अधिक घर हुए और 14 सैइया कहलाए. हमारे टाइटल अलग-अलग हैं. गयाजी में गयापाल पंडों को अलग-अलग टाइटल वाले नाम से भी जाना जाता है. इसमें सबसे पहले मैं अपने बारे में बता दूं, कि पूर्वज से और आज तक हम लोगों को तीर्थयात्री हाथी वाले पंडा के नाम से ही जानते हैं. गुजरात रियासत से दो हाथी हमें मिले थे.
शंभू लाल विट्ठल हाथी वाले पंडा.
सोने के कड़ा वाले पंडा जी
जयपुर रियासत से एक कीमती सोने का कड़ा गयापाल पंडों के एक परिवार को उपहार में मिला था. यह साधारण गहना नहीं था, बल्कि शाही घराने की निशानी थी. जब पंडा जी यह कड़ा पहनकर यात्रियों से मिलते तो लोग दूर से ही उनकी शान पहचान जाते. सोने का वह कड़ा ही उनकी पहचान बन गया और पीढ़ियों से यह घराना “सोना का कङा वाले पंडा जी” कहलाने लगा. आज भरत बाबू इसी नाम से विख्यात हैं.
नेपाल की लाल मोहर की कहानी
नेपाल के राजवंश ने गयापाल पंडों को लाल मोहर दी थी. यह केवल ताम्रपत्र या सिक्का नहीं था, बल्कि अधिकार की मुहर थी. इसके तहत नेपाल से आने वाले सभी यात्री सिर्फ इसी परिवार के जरिए पिंडदान कर सकते थे. यह सम्मान गयापाल परंपरा में बहुत बड़ा माना गया. तभी इस घराने का नाम पड़ा — “लाल मोहर वाले पंडा जी”. आज द्वारका लाल टाटक और जनार्दन लाल टाटक इस गौरवशाली परंपरा के उत्तराधिकारी हैं.
घड़ी घंटा वाले पंडा जी
उस जमाने में जब भारत में जेब घड़ियां आम नहीं थीं, इस परिवार ने स्विट्जरलैंड से घड़ी मंगवाई. हर घंटे बजने वाली उसकी घंटी लोगों को चकित कर देती. कहते हैं, घाट पर आने वाले यात्री समय पूछने के लिए सीधे इन पंडा जी के घर चले जाते. समय बताने की यह विशेषता ही उनकी पहचान बन गई. इसीलिए उन्हें सबने पुकारना शुरू किया — “घड़ी घंटा वाले पंडा जी.
पीतल किवाड़ से बनी पहचान
महेश गुप्त के घर का बड़ा दरवाजा बाकी घरों से अलग था. पूरा दरवाजा चमकते पीतल का बना हुआ था. घाट पर आने वाले लोग रास्ता पूछते तो कहा जाता — “उस घर तक जाइए, जहां पीतल का किवाड़ है.” धीरे-धीरे घराने की पहचान ही उस दरवाजे से हो गई और परिवार पीतल किवाड़ वाले पंडा जी कहलाने लगे.
मूंछ और दाढ़ी वाले पंडा जी
कुछ परिवारों की पहचान बाहरी रूप से बनी. जिनकी घनी मूंछें उनके व्यक्तित्व को राजसी बनाती थीं, वे “मूंछ वाले पंडा जी” कहलाए. वहीं जिनकी लंबी-घनी दाढ़ी उन्हें संत जैसा आभामंडल देती थी, उन्हें “दाढ़ी वाले पंडा जी” कहा जाने लगा. यह परंपरा इतनी गहरी रही कि पीढ़ियों बाद भी इन नामों से ही लोग पहचानते हैं.

भैया स्टेट और सिजवार स्टेट वाले पंडा
केशव लाल भैया का रुतबा ऐसा था कि मुख्यमंत्री तक उन्हें भैया जी कहकर बुलाते. उनके प्रभाव और लोकप्रियता के कारण उनका घराना “भैया स्टेट वाले पंडा जी” कहलाया. दूसरी ओर, सिजवार स्टेट वाले पंडे अपनी सामाजिक ताकत और संगठित प्रभाव के लिए प्रसिद्ध हुए. उनके नाम से इलाके में सम्मान और भय दोनों जुड़ा था.
मुख्यमंत्री ने एक बार कहा था कि आपका नाम ही ऐसा है कि हमें भैया स्टेट यानी भैया जी पंडा जी बोलना पड़ता है. यह नाम पूर्वज से चला रहा है. सदियों से चला आ रहा है. उसी से हमारी पहचान है.
केशव लाल भैया गयापाल पंडा


