माता सावित्रीबाई फुले की पुण्यतिथि पर बिहारशरीफ में श्रद्धांजलि, सामाजिक न्याय और शिक्षा पर जोर
एम ए न्यूज डेस्क नीरज कुमार के रिपोर्ट

बिहारशरीफ, नालंदा | 10 मार्च 2026
बिहारशरीफ के ब्लॉक चौक स्थित आनंद मार्ग में अतिपिछड़ा/दलित/अल्पसंख्यक संघर्ष मोर्चा एवं फुटपाथ संघर्ष मोर्चा के तत्वावधान में भारत की पहली महिला शिक्षिका और महान समाज सुधारक Savitribai Phule की पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस अवसर पर उनके चित्र पर माल्यार्पण कर पुष्प अर्पित किए गए और उनके सामाजिक योगदान को याद किया गया।
कार्यक्रम में मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं फुटपाथ संघर्ष मोर्चा के जिला अध्यक्ष रामदेव चौधरी ने कहा कि Savitribai Phule भारत की पहली महिला शिक्षिका, महान समाज सुधारक, शिक्षाविद और कवयित्री थीं। उनका जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव में हुआ था। उन्होंने अपने पति Jyotirao Phule के साथ मिलकर महिलाओं और पिछड़े वर्गों की शिक्षा तथा सामाजिक समानता के लिए संघर्ष किया।

उन्होंने बताया कि सावित्रीबाई फुले का विवाह मात्र 9 वर्ष की आयु में ज्योतिराव फुले से हुआ था। विवाह के समय वह अशिक्षित थीं, लेकिन उनके पति ने उन्हें शिक्षा के लिए प्रेरित किया। इसके बाद उन्होंने शिक्षक प्रशिक्षण प्राप्त किया और वर्ष 1848 में पुणे के भिड़ेवाड़ा में लड़कियों के लिए भारत का पहला स्कूल शुरू किया।
रामदेव चौधरी ने कहा कि उस समय रूढ़िवादी समाज के लोग उनके इस प्रयास का विरोध करते थे और स्कूल जाते समय उन पर पत्थर, कीचड़ और गोबर तक फेंकते थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और शिक्षा के माध्यम से समाज में बदलाव लाने का काम जारी रखा।
इस मौके पर डॉ. भीमराव अंबेडकर संघर्ष विचार मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनिल पासवान ने कहा कि सावित्रीबाई फुले ने अपने पति ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर लड़कियों और दलितों की शिक्षा के लिए अभूतपूर्व कार्य किए। उन्होंने छुआछूत और सती प्रथा जैसी कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाई और सत्यशोधक समाज की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उन्होंने कहा कि सावित्रीबाई फुले ने महिलाओं के अधिकारों के लिए 1852 में महिला सेवा मंडल की स्थापना की तथा 1863 में बेसहारा गर्भवती विधवाओं के लिए बालहत्या प्रतिबंधक गृह की शुरुआत की।

सावित्रीबाई फुले ने अपने जीवन में शिक्षा, समानता और सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष किया। वर्ष 1897 में पुणे में प्लेग महामारी के दौरान मरीजों की सेवा करते हुए वह स्वयं संक्रमित हो गईं और 10 मार्च 1897 को उनका निधन हो गया।
कार्यक्रम में जिला महासचिव उमेश पंडित, शैलेंद्र कुमार, राजीव कुमार, चंदन कुमार, मोनू कुमार और परमानंद सिंह सहित कई लोग मौजूद रहे।



